
चमोली, 5 सितंबर, 26. हिमालय महाकुंभ के रूप में प्रसिद्ध मां नंदा की बड़ी जात यात्रा शनिवार पांच सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हो गई. मां नंदा की डोली के रवाना होते ही पूरा कुरुड़ क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा. डोली के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा में शामिल हुए.
सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिवसीय पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया. विदाई के दौरान श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं. भक्तों ने मां की डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और यात्रा के सफल होने की कामना की.
🔱 मां नन्दा की डोली जब चलती है… तो पूरा पहाड़ झूम उठता है
नन्दा देवी राजजात यात्रा 2026 – श्रद्धा, साहस और संस्कृति का अद्वितीय संगम।#NandaRajJat2026 #MaaNandaKiYatra #UttarakhandHeritage #Rajjat #ChamoliPolice #12YearsOfFaith pic.twitter.com/YaRV4TalmZ
— Chamoli Police Uttarakhand (@chamolipolice) July 17, 2025
विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा
मां नंदा देवी की यात्रा विश्व की सबसे लंबी करीब 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा है. सामान्य लोकजात यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए वेदनी कुंड तक पहुंचती है, लेकिन इस बार बड़ी जात यात्रा का मार्ग आगे बढ़ाते हुए डोली को सीधे होमकुंड तक ले जाया जाएगा. यहां विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना के बाद बड़ी जात यात्रा का समापन होगा.
कुरुड़ से रवाना होने के बाद मां नंदा की डोली यात्रा के निर्धारित पड़ावों से होकर हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ेगी. यात्रा के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धालु मां की डोली का स्वागत करेंगे और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेंगे. यात्रा के अंतिम चरण में डोली होमकुंड पहुंचेगी, जहां धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे.
बड़ी जात यात्रा को लेकर चमोली ही नहीं, बल्कि प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. 12 वर्ष बाद आयोजित हो रही इस बड़ी जात यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है. जगह-जगह मां नंदा के जयकारों और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों से माहौल भक्तिमय बना हुआ है.
आज पांच सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरु हुई तीनों डोलियां कैलाश के लिए रवाना हो गई, जो विभिन्न पड़ावों से होते हुए यात्रा 12 सितंबर को रामणी पहुंचेगी. यहीं पर विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा. इसके बाद यात्रा आला, सितेल और कनोंल होते हुए आगे बढ़ेगी. 15 सितंबर को वाण स्थित लाटू मंदिर में मां नंदा की डोली का प्रवास होगा. वाण से गैरोली पाताल होते हुए 18 सितंबर को उत्सव डोली वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां सप्तमी की पूजा-अर्चना होगी. 19 सितंबर को यात्रा बगुवावासा, पातरनचैणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेगी.
30 सितंबर को होमकुंड में होगा समापन
बड़ी जात यात्रा का मुख्य धार्मिक अनुष्ठान 30 सितंबर को होमकुंड में प्रस्तावित है. यहां मां नंदा की डोली की पूजा-अर्चना और विधि-विधान से धार्मिक प्रक्रिया संपन्न होने के बाद बड़ी जात का समापन होगा. हर वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर नंदा देवी की लोकजात यात्रा की तिथि तय की जाती है. मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से गुजरते हुए अपने मायके से ससुराल कैलाश की ओर प्रस्थान करती है. बड़ी जात यात्रा इसी परंपरा का विस्तृत और विशेष धार्मिक स्वरूप है, जिसमें हजारों श्रद्धालु मां नंदा के साथ हिमालय की ओर यात्रा करते हैं.
तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान पूजा-पाठ, अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया गया. इसके बाद तीनों डोलियां हर्षोल्लास के साथ कैलाश के लिए रवाना हुईं. बधाण क्षेत्र की नंदा की डोली इस बार बड़ी जात में शामिल नहीं होगी, इस संबंध में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. डोली के शामिल न होने को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, उनमें विरोधाभास है. इस मामले में जिलाधिकारी चमोली से भी वार्ता की जाएगी और जानकारी जुटाई जाएगी कि डोली के यात्रा में शामिल न होने की वास्तविक वजह क्या है?
-कर्नल हरेंद्र सिंह रावत, अध्यक्ष, बड़ी जात मंदिर समिति
इस वर्ष कुरुड़ की बड़ी जात यात्रा, अगले वर्ष राजजात यात्रा
बता दें कि, इस साल कुरुड़ मंदिर समिति बड़ी जात यात्रा का आयोजन कर रही है. 12 वर्ष का समय चक्र इस साल पूरा होने के कारण कुरुड़ समिति ने अपनी परंपरा के अनुसार इसी साल 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक यात्रा को आयोजित करने का फैसला लिया है.
वहीं, मुख्य नंदा देवी राजजात यात्रा 2027 में होगी. नौटी राजजात समिति और प्रशासन ने इसे 2027 तक स्थगित करने का सर्वसम्मति से फैसला लिया है. समिति और प्रशासन का मानना है कि 2026 के पंचांगीय कालक्रम के दौरान मलमास आ रहा है और ऐसे समय में हिंदू मान्यताओं के अनुसार, बड़े स्तर के मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं. इस स्थिति को देखते हुए पंचांगीय गणना के आधार पर यात्रा को 2027 तक आगे बढ़ाया गया.
विवाद किस बात पर हुआ?
दरअसल, 2026 का राजजात की तैयारी नौटी की आयोजन समिति कर रही थी. समिति के प्रस्तावित रूट में यात्रा की शुरुआत नौटी से और शुरुआती पड़ाव इडाबधाणी रखा गया. कुरुड़ पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यात्रा की परंपरा में कुरुड़ का स्थान महत्वपूर्ण रहा है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
नौटी समिति ने राजजात क्यों स्थगित की?
नौटी की श्री नंदा देवी राजजात समिति ही 2026 की राजजात यात्रा की तैयारी करा रही थी. समिति ने जनवरी में 2026 का आयोजन स्थगित करने का फैसला लिया. समिति का कहना था कि इस बार मलमास के कारण यात्रा का हिमालयी चरण सितंबर के दूसरे पखवाड़े में पहुंच रहा है। 20 सितंबर के आसपास ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रा होने से बर्फबारी, ओलावृष्टि और बारिश का खतरा रहेगा.
12 साल का चक्र, लेकिन हर बार 12 साल बाद ही यात्रा नहीं हुई
नंदा देवी की राजजात को आम तौर पर 12 साल के अंतराल से जोड़ा जाता है, लेकिन हर बार यात्रा ठीक 12 साल बाद ही हुई हो, ऐसा नहीं है. 1968 के बाद 1987 में यात्रा हुई. इसके बाद 2000 में आयोजन हुआ. 2012 में यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन 2013 की आपदा के कारण इसे टालना पड़ा और बाद में 2014 में यात्रा हुई. इसी पुराने क्रम को देखते हुए इस बार 2026 में यात्रा को लेकर विवाद खड़ा हुआ. नौटी पक्ष ने मौसम और तैयारियों को देखते हुए राजजात 2027 में कराने की बात कही. कुरुड़ पक्ष इससे सहमत नहीं हुआ और उसने 2026 में ही बड़ी जात निकालने का फैसला किया.



