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‘तीन बच्चे पैदा करने चाहिए, यह देश के लिहाज से ठीक’, बोले मोहन भागवत

नई दिल्ली, 28 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने देश की जनसंख्या का जिक्र करते हुए कहा कि पर्याप्त जनसंख्या के लिए परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए. अगर तीन बच्चे होते हैं, तो माता-पिता और बच्चों सभी का स्वास्थ्य ठीक रहता है. देश के नजरिए से तीन बच्चे ठीक हैं. तीन से बहुत ज्यादा आगे बढ़ने की जरूरत नहीं है.
आरएसएस के 100 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, “भारत की जनसंख्या नीति 2.1 बच्चों की बात करती है, जिसका अर्थ है कि एक परिवार में तीन बच्चे. हर नागरिक को यह देखना चाहिए कि उसके परिवार में तीन बच्चे हों.” उन्होंने कहा, “सभी नागरिकों को तीन बच्चे पैदा करने पर विचार करना चाहिए, जिससे जनसंख्या पर्याप्त हो और कंट्रोल में भी रहे.”
भागवत ने कहा कि जब किसी ने गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) से पूछा कि क्या विभाजन होगा, तो संघ ने इसका विरोध किया था. उन्होंने कहा कि उस वक्त संघ की ताकत बहुत कम थी. विभाजन के खिलाफ कोशिश की गई थी, और बीच में मिलने की कोशिश भी हुई, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता. उन्होंने आगे कहा कि ‘अखंड भारत’ को ध्यान में रखना सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह एक सच्चाई है. यह जिंदगी का एक फैक्ट है. यह भारत की वास्तविकता को दर्शाता है.
‘वीर अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम…’
पिछले कुछ साल से देश में शुरू हुई ‘शहरों के नाम बदलने की राजनीति’ पर मोहन भागवत ने कहा, “आक्रमणकारियों के नाम पर शहरों और रास्तों के नाम नहीं होने चाहिए. मैंने मुस्लिम के नाम न हो ऐसा नहीं कहा. वीर अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम के नाम पर होने चाहिए. आक्रांताओ के नाम नहीं होने चाहिए. इसके अलावा उन्होंने कहा कि जातिगत आरक्षण पर संवेदना से विचार करना चाहिए. दीनदयाल जी ने एक दृष्टि दी है, जो नीचे है उसे ऊपर आने के लिए हाथ उठाकर कोशिश करनी चाहिए, और ऊपर जो है उसे हाथ पकड़ कर ऊपर खींचना चाहिए. संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का समर्थन है.
‘हर शख्स को कला का ज्ञान जरूरी…’
इसके साथ ही, शिक्षा पर बात करते हुए मोहन भागवत ने बताया, “नई शिक्षा नीति में पंचकोशीय शिक्षा का विचार शामिल किया गया है, जिसमें कला, खेल और योग का भी समावेश है. यह धीरे-धीरे विकसित किया जाना चाहिए.” भागवत के मतुाबिक, हर शख्स को कला का ज्ञान होना चाहिए. संगीत ऐसा हो कि सबके कानों को भा सके, भले ही बुद्धि से हर कोई उसे न समझ पाए. हालांकि, उन्होंने कहा कि इसे बाध्यकारी नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि अनिवार्यता से अक्सर विरोध उत्पन्न होता है. संस्कृत पर जोर देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा की मुख्यधारा को गुरुकुल प्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए. अगर भारत की वास्तविक पहचान को समझना है, तो संस्कृत का ज्ञान बेहद जरूरी है.