दूसरे राज्य से आया अनुसूचित जाति का व्यक्ति उत्तराखंड में एससी आरक्षण का हकदार नहीं: हाईकोर्ट

नैनीताल, 26 नवम्बर। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्य की अनुसूचित जाति की महिलाएं जो विवाह के उपरांत उत्तराखंड में बसी हैं, उन्हें राज्य की सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाएगा। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकल पीठ ने यह फैसला अंशु सागर और सहित कई अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया।
आरक्षण प्रवास के साथ स्थानांतरित नहीं होता: कोर्ट
कोर्ट ने माना कि आरक्षण का अधिकार क्षेत्र विशिष्ट होता है और यह प्रवास के साथ स्थानांतरित नहीं होता। याचिकाकर्ता महिला अंशु सागर जो मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की निवासी है, उसका विवाह उत्तराखंड की अनुसूचित जाति के युवक से हुआ। वे जन्म से जाटव जाति से हैं, जो यूपी में भी अनुसूचित जाति है। विवाह के बाद उन्होंने उत्तराखंड के जसपुर से जाति प्रमाण पत्र और स्थायी निवास प्रमाण पत्र प्राप्त किया और सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक भर्ती के लिए आरक्षण का दावा किया जिसे विभाग ने अस्वीकार कर दिया था।
आरक्षण का लाभ केवल उत्तराखंड के मूल निवासियों के लिए
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि 16 फरवरी 2004 और अन्य शासनादेशों के अनुसार आरक्षण का लाभ केवल उत्तराखंड के मूल निवासियों के लिए है। सरकार ने दलील दी कि पड़ोसी राज्यों के निवासी, भले ही वे उत्तराखंड से जाति प्रमाण पत्र बनवाने में सफल हो जाएं, सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के हकदार नहीं होंगे। यह तर्क दिया गया कि जाति का दर्जा जन्म से तय होता है विवाह से नहीं।
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मैरी चंद्रशेखर राव और श्रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड राज्य जैसे प्रमुख फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही यह सिद्धांत स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति की सूची उस राज्य के संबंध में होती है। इसलिए एक राज्य में अनुसूचित जाति माना जाने वाला व्यक्ति दूसरे राज्य में स्वत: ही वह दर्जा हासिल नहीं कर सकता।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि प्रवास चाहे वह स्वैच्छिक हो या अनैच्छिक (जैसे शादी के कारण) किसी व्यक्ति को दूसरे राज्य में आरक्षण का अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रवासियों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है तो यह उस राज्य के मूल अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा। एक राज्य का आरक्षित वर्ग दूसरे राज्य में सामान्य वर्ग के रूप में माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि भले ही दोनों राज्यों (मूल राज्य और प्रवास वाले राज्य) में जाति का नाम समान हो फिर भी आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।
यूपी में जन्मी एससी की महिला उत्तराखंड में एससी कोटे की हकदार नहीं
अंशु सागर के मामले में भले ही जाटव या वाल्मीकि जाति दोनों राज्यों में अनुसूचित जाति सूची में है, फिर भी यूपी में जन्मी महिला उत्तराखंड में एससी कोटे की हकदार नहीं हो सकती। जाति प्रमाण पत्र जारी होना भी सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ के फैसलों की कठोरता को कम नहीं कर सकता। इस आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत को खारिज कर दिया और उनकी रिट याचिकाएं निरस्त कर दी गईं। यह फैसला भविष्य में अन्य राज्यों से आकर उत्तराखंड में बसने वाले उम्मीदवारों के लिए एक स्पष्ट नजीर पेश करेगा है।



