
देहरादून, 21 फरवरी। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है. एक ओर जहां लाखों छात्र लंबे समय से बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटे थे, वहीं दूसरी ओर एक राजनीतिक विवाद अब इन परीक्षाओं के भविष्य पर ही सवाल खड़े कर रहा है. मामला एक भाजपा विधायक पर प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के साथ मारपीट के गंभीर आरोपों से जुड़ा है. जिसके बाद प्रदेश भर के शिक्षक आक्रोशित हो उठे हैं. उन्होंने बोर्ड परीक्षाओं में अपनी सेवाएं देने या न देने को लेकर मंथन शुरू कर दिया है.
प्रदेश के शिक्षक संगठनों में भारी रोष, धरना प्रदर्शन
घटना की जानकारी मिलते ही प्रदेश के शिक्षक संगठनों में भारी रोष फैल गया. शिक्षकों का कहना है कि यदि एक वरिष्ठ शिक्षा अधिकारी अपने ही कार्यालय में सुरक्षित नहीं है, तो आम शिक्षक और कर्मचारी किस भरोसे से काम करें. इसी आक्रोश के चलते शिक्षकों ने शिक्षा निदेशालय के बाहर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. प्रदर्शनकारी शिक्षकों ने निदेशालय के सामने मौजूद सड़क को जाम कर दिया, जिससे यातायात भी प्रभावित हुआ.
बोर्ड परीक्षाओं पर पड़ सकता है असर
शिक्षकों का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है. शिक्षक संगठनों के बीच इस बात को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है कि क्या वे आगामी बोर्ड परीक्षाओं में अपनी सेवाएं देंगे या नहीं. यह निर्णय बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि बोर्ड परीक्षाओं के संचालन में शिक्षकों की भूमिका अनिवार्य होती है, चाहे वह परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था हो, उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन या निगरानी का कार्य.
शिक्षकों की आरोपी विधायक काऊ को गिरफ्तार करने की चेतावनी
सरकार और प्रशासन से बातचीत जारी है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस मामले में आरोपी विधायक की गिरफ्तारी नहीं होती है और शिक्षकों की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तो संगठन बोर्ड परीक्षाओं के बहिष्कार का फैसला ले सकता है. उनके मुताबिक, यह निर्णय किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि शिक्षकों के सम्मान और सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाएगा.
राम सिंह चौहान, अध्यक्ष, राजकीय शिक्षक संघ
सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि यदि शिक्षक बोर्ड परीक्षाओं का बहिष्कार करते हैं, तो इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा. उत्तराखंड में आज से ही बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं. छात्र महीनों से इसकी तैयारी कर रहे थे. परीक्षा प्रक्रिया के बाधित होने से न सिर्फ परीक्षा कार्यक्रम बिगड़ सकता है, बल्कि छात्रों का मानसिक तनाव भी बढ़ेगा.
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद में छात्रों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं उठाना चाहिए. सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे जल्द से जल्द इस मामले का समाधान निकालें, ताकि शिक्षा व्यवस्था पटरी पर बनी रहे.वहीं, अभिभावकों में भी इस बात को लेकर चिंता गहराती जा रही है कि कहीं राजनीतिक टकराव की कीमत उनके बच्चों को न चुकानी पड़े.



