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पूर्व सीएम और महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण पुरस्कार

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देहरादून, 25 जनवरी। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण पुरस्कार मिला है। RSS से जुड़े रहे कोश्यारी, उत्तराखंड भाजपा के पहले प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। देवभूमि उत्तराखंड के साथ ही महाराष्ट्र में इनकी राजनीति की धमक रही है।
सम्मान से बढ़ा उत्तराखंड का गौरव
पद्म भूषण सम्मान की घोषणा के बाद उत्तराखंड में खुशी की लहर है. राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम जनता ने इसे पहाड़ की मेहनत, संघर्ष और योगदान का सम्मान बताया है. भगत सिंह कोश्यारी का यह सफर एक साधारण गांव से लेकर देश के शीर्ष पदों तक पहुंचने की प्रेरक कहानी है.
राजनीति से समाजसेवा तक का लंबा सफर
भगत सिंह कोश्यारी का जन्म उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में हुआ. एक साधारण किसान परिवार से आने वाले कोश्यारी ने शिक्षा को अपना पहला हथियार बनाया. उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की. शिक्षक के रूप में भी कार्य किया. छात्र जीवन से ही वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे. कोश्यारी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के साथ की। आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और जेल भी गए. यही दौर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को मजबूत करने वाला साबित हुआ.
उत्तराखंड आंदोलन और राज्य निर्माण में भूमिका
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान भगत सिंह कोश्यारी अग्रणी भूमिका में रहे. उन्होंने अलग राज्य की मांग को लेकर जनभावनाओं को आवाज दी. केंद्र तक इस मुद्दे को प्रभावी तरीके से पहुंचाया. राज्य गठन के बाद वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने. सीमित संसाधनों वाले इस नवगठित राज्य को प्रशासनिक रूप से मजबूत आधार देने का प्रयास किया.
ऐसा रहा राजनीतिक सफर
अल्मोड़ा संसदीय सीट से वर्ष 1989 के चुनाव की हार के बाद भगत दा को लोकसभा सदस्य बनने के लिए 25 वर्ष का लंबा इंतजार करना पड़ा। संसदीय चुनाव के इतिहास में वर्ष 1989 का चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के लिए बेहद खास रहा। उस समय भगत सिंह कोश्यारी 47 वर्ष के थे। उस चुनाव में कुछ ऐसा हुआ, जिसके बाद संसदीय चुनावों से उन्होंने एक तरह से अघोषित संन्यास ही ले लिया।
1989 में भगत सिंह कोश्यारी ने अल्मोड़ा से संसदीय सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा। वर्ष 1980 व 1984 में लगातार हार के बाद बीजेपी के दिग्गज इलाहाबाद को पलायन कर चुके थे। उन्हें कांग्रेस के युवा तुर्क हरीश रावत ने हराया। जिसके बाद बीजेपी ने संघ से जुड़े भगत सिंह कोश्यारी को टिकट दिया। उनके सामने कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत खड़े थे। जो वर्ष 1980 व 1984 में लगातार लोकसभा चुनाव जीतते आ रहे थे।
वहीं एक दिग्गज और इस चुनावी मैदान में खड़ा था। एक दशक पहले उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना भी हुई थी। अलग राज्य उत्तराखंड के प्रखर पक्षधर काशी सिंह ऐरी। यह वह दौर था जब उत्तरप्रदेश से अलग एक पहाड़ी राज्य की मांग जोरों पर थी। इसलिए पहाड़ी जिलों में उक्रांद का जनाधार भी लगातार बढ़ रहा था। चुनाव परिणाम अप्रत्याशित रहे।
हार से हताश भगतदा दो वर्ष बाद 1991 में हुए चुनाव में टिकट की दौड़ से खुद हट गए। तब बीजेपी ने नए चेहरे जीवन शर्मा को टिकट दिया। राम लहर में वह चुनाव जीत गए। 1989 के संसदीय चुनाव हारने के बाद भगतदा को लोकसभा सदस्य बनने के लिए 25 वर्ष इंतजार करना पड़ा। वह 72 वर्ष की उम्र में साल 2014 में मोदी लहर में नैनीताल-ऊधम सिंह नगर से चुनाव जीतने में सफल रहे।

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