
सतपुली/जयहरीखाल, 31 जनवरी। पौड़ी नेशनल हाईवे पर गुमखाल-सतपुली के बीच चल रहे चौड़ीकरण कार्य के कारण दो से पांच फरवरी तक रात को यातायात बंद रहेगा। सतपुली मल्ली के पास किमी 188.5 पर भू-धंसाव के कारण पहाड़ी पर बोल्डर लटके होने और उनसे दुर्घटना की आशंका के कारण यह निर्णय लिया गया है। एनएच खंड और उसकी कार्यदायी एजेंसी इन चार दिनों में रात को 9 से सुबह 6 बजे तक लटके बोल्डरों को हटाएगा। एनएच खंड लोनिवि धुमाकोट के अधिशासी अभियंता जितेंद्र कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि कार्य अवधि के दौरान रात्रि में हाईवे के स्थान पर वैकल्पिक मार्ग सतपुली–कांडाखाल–सिसल्डी–डेरियाखाल से यातायात डायवर्ट किया जाएगा.
कोटद्वार–पौड़ी हाईवे पर पहाड़ कटिंग का काम तेज
कोटद्वार–पौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग पर गुमखाल-सतपुली के बीच सड़क चौड़ीकरण के तहत पहाड़ कटिंग का कार्य तेजी से चल रहा है। गुमखाल बाजार से भी सतपुली की ओर पहाड़ कटिंग का कार्य शुरू कर दिया गया है। सतपुली से गुमखाल की ओर गहड़ गांव तक का कटिंग कार्य लगभग पूरा हो चुका है। भारी मशीनों की मदद से चट्टानों को हटाकर सड़क को चौड़ा किया जा रहा है। लंबे समय से संकरी सड़क और तीखे मोड़ों के कारण यातायात संचालन में परेशानी हो रही थी। सड़क चौड़ीकरण से गुमखाल, सतपुली सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ मिलेगा।
दो से पांच फरवरी तक रात्रि के समय यातायत हाईवे के बजाय वैकल्पिक मार्ग सतपुली- कांडाखाल-सिसल्डी-डेरियाखाल पर डायवर्ट रहेगा। दस दिन पूर्व सतपुली मल्ली के पास इसी स्थान पर भारी भरकम बोल्डरों के गिरने से हाईवे पर तीन दिन तक आवाजाही ठप हो गई थी। वैकल्पिक मार्ग से सतपुली से कोटद्वार की कुल दूरी 54 किमी के बजाय 97 किमी पड़ेगी। दिन के समय हाईवे पर सामान्य ढंग से आवाजाही रहेगी।
जितेंद्र कुमार, अधिशासी अभियंता, एनएच खंड लोनिवि धुमाकोट
प्रभावित परिवारों को मुआवजा न मिलने पर जताया रोष
गुमखाल-सतपुली के बीच स्थित बैरगांव एवं गहड़ गांव की प्रधान भगवती देवी और ग्रामीण बीरेंद्र डोबरियाल सहित अन्य ग्रामीणों ने विभाग पर अभी तक प्रभावितों को मुआवजा नहीं दिए जाने का आरोप लगाया है। कहा कि सड़क कटिंग के कारण कई ग्रामीणों की भूमि और परिसंपत्तियां प्रभावित हुई हैं। कहा कि इस संबंध में कई बार विभागीय अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों को फिर से आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।



