
ऋषिकेश: उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा 2026 का शुभारंभ भले ही 19 अप्रैल से होगा, लेकिन आज ऋषिकेश से 7 श्रद्धालु पैदल ही चारधाम यात्रा के लिए रवाना हो गए हैं. महामंडलेश्वर ईश्वर दास ने इन श्रद्धालुओं को हरी झंडी दिखाकर यात्रा मार्ग पर भेजा. जिसके बाद जय-जयकार करते हुए श्रद्धालु चारधाम के लिए रवाना हुए.
पैदल यात्रा में 4 पुरुष और 3 महिलाएं शामिल: बता दें कि कर्नाटक और महाराष्ट्र के इन श्रद्धालुओं में 4 पुरुष और 3 महिलाएं शामिल हैं. यात्रा मार्ग पर जाने से पहले इन श्रद्धालुओं में पैदल यात्रा को लेकर उत्साह देखा गया है. सभी श्रद्धालुओं का कहना है कि वो मां गंगा की पवित्रता और चारों धामों में स्वच्छता बनाए रखने का संदेश भी लोगों को देंगे. पैदल यात्रा के महत्व के बारे में भी जानकारी साझा करेंगे.
पहली बार कर रहे चारधाम की पैदल यात्रा: ये सभी श्रद्धालु चारधाम यात्रा पर पहली बार पैदल यात्रा के लिए आए हैं. इससे पहले ये सभी नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं. श्रद्धालुओं ने बताया कि ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन 17 अप्रैल से शुरू होने हैं. फिलहाल एक श्रद्धालु का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन है. बाकी के रजिस्ट्रेशन रास्ते में चलते-चलते ऑनलाइन या ऑफलाइन कराए जाएंगे.
“हमारा संदेश है कि नदियों को स्वच्छ बनाए रखने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए. हम भी यही करने का प्रयास कर रहे हैं. इसलिए हम अपने साथ अपने खुद के बर्तन लेकर यात्रा पर निकले हैं. डिस्पोजल का इस्तेमाल हम नहीं करेंगे. लोगों से भी अपील है कि डिस्पोजल या प्लास्टिक का इस्तेमाल ना करें. पर्यावरण को सुंदर और सुरक्षित रखने में सहयोग करें.“- चारधाम पैदल यात्री
अलग ही अनुभव कराएगा पैदल यात्रा: वहीं, महामंडलेश्वर ईश्वर दास ने बताया कि वर्तमान समय में सुविधाजनक यात्रा का प्रचलन तेजी से बढ़ गया है. कोई हवाई जहाज तो कोई हेलीकॉप्टर से चारों धामों की यात्रा कर रहा है. ज्यादातर लोग सार्वजनिक परिवहन कंपनियों के अलावा प्राइवेट वाहनों से धामों में दर्शनों के लिए जा रहे हैं, लेकिन इन सब के बीच पैदल यात्रा करना अलग ही अनुभव प्रदान करता है.
पहले थी ये परंपरा: गौर हो कि लगभग चार से पांच दशक पहले जो भी श्रद्धालु चारधाम यात्रा के लिए आते थे, वो पैदल ही जाते थे. यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु अमूमन बुजुर्ग हुआ करते थे. यात्रा पर जाने से पहले श्रद्धालु अपनी 13वीं करके जाते थे. यात्रा पर जाने का उनका उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त करना होता था. अगर फिर भी यात्रा करके कोई अपने घर वापस पहुंचता था तो उसका भव्य स्वागत और पूजा होती थी.



