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सरोवर नगरी नैनीताल में मां नंदा देवी मेले का आगाज, केले के पेड़ से बनाई गई देव मूर्तियां

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नैनीताल, 30 अगस्त। सरोवर नगरी नैनीताल में मां नंदा देवी के मेले का आगाज हो गया है. कदली वृक्ष यानी केले के पेड़ से मां नंदा सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण कर दिया गया है. जिसके बाद अब ब्रह्म मुहूर्त में मां नंदा और सुनंदा की इन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा कर भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा.

केले के पेड़, रुई, बांस, कपास से बनाई जाती हैं मूर्तियां
नैनीताल में मां नंदा सुनंदा की मूर्तियों को पूर्ण रूप से हाथों से बनाया जाता है और ये मूर्तियां पूरी तरह से इको फ्रेंडली होती है. इन मूर्तियों को बनाने में रुई, बांस, कपास, केले के पेड़ समेत प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है. मूर्तियों को इको फ्रेंडली बनाने का मुख्य कारण है कि डोला विसर्जन के बाद इनसे निकलने वाले पदार्थ किसी प्रकार से प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

मां नंदा सुनंदा खुद लेती हैं अपना स्वरूप
कई वर्षों से मां नंदा सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण कर रहीं कलाकार आरती बताती हैं कि मां नंदा और सुनंदा अपना आकर (स्वरूप) खुद धारण करती हैं. कभी मां का हंसता हुआ चेहरा बनता है, तो कभी दुख भरा सामने आता है. जिससे आने वाले समय का भी आकलन किया जाता है कि आने वाला समय कैसा होगा. कई सालों से मां की मूर्ति को आकर दे रहे कलाकार बताते हैं कि उनके द्वारा मां की मूर्ति के निर्माण में जो भी रंग और सामान प्रयोग में लाए जाते हैं, वो पूरी तरह से इको फ्रेंडली होते हैं.

गहनों से सजाई जाती हैं मूर्तियां
वहीं मां की मूर्ति के निर्माण में करीब 24 घंटे का समय लगता है. जिसको बांस, कपड़ा, रूई आदी से बनाया जाता है. जिसके बाद मां की मूर्ति को सोने चांदी के सुंदर गहनों से सजा दिया जाता है. जिसके बाद ही मां की मूर्ति को भक्तों के दर्शन के लिए खोला जाता है.

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां नंदा सुनंदा अपने ससुराल जा रही थीं. तभी राक्षस रूपी भैंस ने नंदा सुनंदा का पीछा किया, जिनसे बचने के लिए मां नंदा सुनंदा केले के पेड़ के पीछे छिप गईं. तभी वहां खड़े बकरे ने उस केले के पेड़ के पत्तों को खा दिया, जिसके बाद राक्षस रूपी भैंस ने मां नंदा सुनंदा को मार दिया. इस घटना के बाद से ही मां नंदा सुनंदा का ये मेला मनाया जाता है. जिसमें मां अष्टमी के दिन स्वर्ग से धरती में अपने ससुराल आती हैं और कुछ दिन यहां रहकर वापस अपने मायके को लौट जाती हैं.

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