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गढ़वाल विवि के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह को हाईकोर्ट से राहत, नियुक्ति मामला याचिका खारिज

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नैनीताल, 15 अप्रैल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने नियुक्ति को UGC और केंद्रीय विश्वविद्यालय नियमों के अनुरूप पाया, जिससे कुलपति को बड़ी राहत मिली है। यह याचिका प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल ने दायर की थी

मामले के अनुसार प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि कुलपति की नियुक्ति केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षकों तथा अन्य अकादमिक स्टाफ की नियुक्ति के लिए न्यूनतम अर्हताएं एवं उच्च शिक्षा में मानकों के अनुरक्षण के उपाय) विनियम, 2018 के प्रावधानों का उल्लंघन करने के खिलाफ हुए हैं.

यूजीसी विनियमों तथा विज्ञापन में निर्धारित स्वयं की पात्रता शर्तों के उल्लंघन में प्रोफेसर प्रकाश सिंह की कुलपति के रूप में निरंतर हुई. जिनकी नियुक्ति मनमानी एवं अवैध है. यह मेरिट-आधारित नियुक्तियों की पवित्रता को क्षति पहुंचाती है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन करती है.

उपर्युक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों के दृष्टिगत, याचिकाकर्ता के पास इस माननीय न्यायालय के समक्ष भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत वर्तमान याचिका प्रस्तुत करने के अतिरिक्त कोई अन्य वैकल्पिक, प्रभावी एवं पर्याप्त उपाय उपलब्ध नहीं है.

कुलपति की नियुक्ति यूजीसी विनियम, 2018 की विनियम 7.3 के प्रतिकूल है. जिसमें विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में न्यूनतम दस वर्षों के अनुभव की अनिवार्यता निर्धारित की गई है. प्रोफेसर सिंह का भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में चेयर प्रोफेसर के रूप में अनुभव को विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि IIPA न तो कोई विश्वविद्यालय है और न ही यूजीसी मानदंडों द्वारा शासित संस्था है.

शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में पात्रता को स्पष्ट रूप से “विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष” तक सीमित किया गया था, जिससे किसी भी प्रकार की समकक्षता या प्रतिस्थापन की कोई गुंजाइश नहीं रहती. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में यह बार-बार प्रतिपादित किया गया है कि चयन समिति चयन प्रक्रिया के मध्य में किसी सार्वजनिक पद हेतु नियुक्ति की पात्रता शर्तों को परिवर्तित/शिथिल नहीं कर सकती.

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