
देहरादून, 5 सितंबर, 26. सात मोड़ फोरलेन सड़क प्रोजेक्ट एलीफेंट कॉरिडोर और हजारों पेड़ों के बीच फंसा हुआ है. जिसके कारण सरकार ने काम रोककर जनसंवाद शुरू किया है. इसकी पहली ही बैठक बेनतीजा रही. ऐसे में अब सवाल है कि सरकार, विकास की सड़क और हाथियों के रास्ते के बीच कैसे रास्ता तलाशेगी?
क्या है सात मोड़ सड़क प्रोजेक्ट
देहरादून से ऋषिकेश के बीच सात मोड़ का जंगल इन दिनों सिर्फ एक सड़क परियोजना का हिस्सा नहीं, बल्कि उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच खड़े उस बड़े सवाल का प्रतीक बन गया है. जिसका आसान जवाब शायद किसी एक पक्ष के पास नहीं है. एक तरफ बढ़ता ट्रैफिक, जौलीग्रांट एयरपोर्ट, पर्यटन और चारधाम यात्रा के दबाव के बीच मौजूदा दो लेन सड़क को चार लेन में बदलने की योजना है, तो दूसरी तरफ इसी सड़क के विस्तार के लिए हजारों पेड़ों की कटाई और जंगल के बीच नया निर्माण स्थानीय लोगों, पर्यावरण प्रेमियों और पर्यावरण एक्टिविस्टों के विरोध का कारण बन गया।
बेनतीजा रही पहली बैठक
अब इस पूरी कहानी में एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण पेंच सामने आया है. सरकार की पहल के बाद NHAI, PWD और स्थानीय प्रशासन ने लोगों के साथ संवाद की कोशिश की, लेकिन पहली पब्लिक कंसल्टेंसी बेनतीजा रही. यानी जिस सवाल का जवाब बातचीत के जरिए खोजा जाना था, उस पर सहमति नहीं बन सकी. यही वजह है कि सात मोड़ की कहानी को सिर्फ पेड़ों की कटाई के विरोध या सड़क चौड़ीकरण के समर्थन के रूप में देखना अधूरा होगा. असल सवाल यह है कि जिस जंगल को सड़क पहले ही दो हिस्सों में बांट चुकी है, वहां सड़क को और सुरक्षित बनाने की कोशिश वन्यजीवों के लिए समाधान बनेगी या समस्या को और बढ़ाएगी?
20 किमी की दो तस्वीरें, जानें क्यों जरुरी है एलिफेंट कॉरिडोर
NHAI की परियोजना प्रस्तुति के मुताबिक भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश NH-7 परियोजना करीब 19.780 किलोमीटर लंबी है. इसका उद्देश्य मौजूदा मार्ग को अपग्रेड कर सुरक्षित और बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है. NHAI के मुताबिक इस पूरे हिस्से का लगभग 8 किलोमीटर भाग वन क्षेत्र से गुजरता है, जबकि परियोजना का व्यापक उद्देश्य देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच बढ़ती यातायात जरूरतों को पूरा करना है.
सात मोड़ एलिफेंट कॉरिडोर की असली चुनौती जंगल
परियोजना निदेशक सौरभ सिंह के मुताबिक यह हाईवे अभी दो हिस्सों में मौजूद है. यह भानियावाला से शुरू होकर ऋषिकेश को कनेक्ट करता है. इसका करीब 10 किलोमीटर हिस्सा आबादी क्षेत्र से गुजरता है, जबकि बाकी करीब 10 किलोमीटर फॉरेस्ट सेक्शन से गुजरता है. इसी फॉरेस्ट सेक्शन में देखा गया कि सड़क एक बड़े वन क्षेत्र को दो हिस्सों में काट देती है. उनका तर्क है कि जब किसी जंगल को सड़क से दो हिस्सों में बांट दिया जाता है तो वन्यजीवों का प्राकृतिक क्रॉस मूवमेंट प्रभावित होता है. सात मोड़ क्षेत्र में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष, हाथियों से होने वाले नुकसान और सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएं इसी समस्या का हिस्सा है. कई बार वाहनों को रेगुलर पेट्रोलिंग के जरिए जंगल पार कराया जाता है. परिस्थितियां खराब होने पर रात में आवाजाही तक प्रतिबंधित करनी पड़ती है.
तीन तरफ से घिरी सरकार, ऊपर से चुनाव सर पर
सत्ताधारी भाजपा भी इस मामले में सीधे विकास या सीधे विरोध के किसी एक छोर पर खड़ी दिखाई नहीं दे रही है. भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का कहना है कि सरकार वन्यजीव संरक्षण और हाथियों के स्वतंत्र विचरण को लेकर गंभीर है. स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है.
इस दुविधा का आखिर क्या है समाधान?
सात मोड़ का विवाद जिस तरह सामने आया है, उसमें दोनों पक्षों के पास अपने-अपने मजबूत सवाल हैं. NHAI का तर्क है कि मौजूदा सड़क बढ़ते यातायात के लिए अपर्याप्त है. तीखे मोड़ों के कारण दुर्घटनाओं का जोखिम है. सड़क पहले से ही वन्यजीवों की आवाजाही को बाधित कर रही है. इसलिए वैज्ञानिक डिजाइन के साथ सड़क सुधार और Elephant Underpasses के जरिए समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है. दूसरी तरफ पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि समाधान के नाम पर जिस जंगल और पेड़ों को नुकसान होगा, उसकी वास्तविक इकोलॉजिकल कॉस्ट क्या होगी? निर्माण के वर्षों के दौरान हाथियों के मौजूदा मूवमेंट पैटर्न का क्या होगा?



