
उत्तरकाशी, 14 सितंबर, 26. घने जंगलों के बीच शांत झील और हिमालयी चोटियों से घिरा है डोडीताल. यह समुद्रतल से लगभग 3,024 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यही वह पवित्र धाम है, जिसे स्थानीय लोग भगवान गणेश की जन्मभूमि मानते हैं. यहां गणेश किसी नाम भर के देवता नहीं, बल्कि ‘डोडीराजा’ के रूप में पूजे जाते हैं. गणेश चतुर्थी पर डोडीताल और आसपास का पूरा कैलासू क्षेत्र आस्था के रंग में रंग जाता है. मान्यता है कि इसी स्थान पर मां पार्वती ने गणेश को जन्म दिया था और मां अन्नपूर्णा के रूप में आज भी उनकी पूजा होती है.
डोडीराजा के रूप में होती है पूजा
स्थानीय लोग गणेश जी को केवल भगवान ही नहीं बल्कि अपना भांजा और रक्षक देवता मानते हैं। इस क्षेत्र में गणेश जी को डोडीराजा (डोडीताल के राजा) के नाम से पूजा जाता है।डोडीताल के तट पर ही भगवान गणेश और माता अन्नपूर्णा का एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है। पास ही अस्सी गंगा नदी का उद्गम स्थल भी है, जिसे गणेश गंगा के नाम से जाना जाता है।
डोडीताल को गणेश जन्मभूमि मानने की परंपरा को स्थानीय लोग स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित प्रसंगों से जोड़ते हैं. केदारखंड के अध्याय 10 में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है. स्थानीय मान्यता में डोडीताल को ‘डुंडीसर’ से भी जोड़ा जाता है. गणेश की पूजा और चतुर्थी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख केदारखंड के अध्याय 11 में भी बताया जाता है. डोडीताल की इस मान्यता का संदर्भ स्वामी तपोवन की पुस्तक ‘हिमगिरि विहार’ में भी स्थानीय लोग बताते हैं. कैलासू क्षेत्र के ग्रामीण पीढ़ियों से इस धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते आए हैं.
केलशू घाटी के दस गांवों में गणेश महोत्सव का शुभारंभ
गणेश चतुर्थी के मौके पर सोमवार को उत्तरकाशी के कैलाशू घाटी के दस गांवों ने गणेश महोत्सव का शुभारंभ किया. कंडार देवता मंदिर से भगवान गणेश की शोभायात्रा निकाली गई. ढोल-दमाऊं और रणसिंघा की गूंज के बीच शोभायात्रा विश्वनाथ मंदिर, मुख्य बाजार, बस अड्डे और भटवाड़ी रोड होते हुए नगर के विभिन्न हिस्सों से गुजरी. अगोड़ा, ढासड़ा, दंदालका, भंकोली, गजोली, नौगांव, सेकू और नाल्ड समेत आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने रासो-तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत कर पारंपरिक संस्कृति की झलक दिखाई.
उबटन से बनाया था पुत्र, शिव ने दिया गजानन का स्वरूप
स्कंद पुराण के केदारखंड के मुताबिक, मां पार्वती स्नान के लिए गईं तो उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए. यही बालक गणेश कहलाए. माता ने उन्हें द्वार पर पहरा देते हुए किसी को भी अंदर नहीं आने देने की आज्ञा दी. इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे. गणेश ने माता की आज्ञा के कारण शिव को भी अंदर जाने से रोक दिया. विवाद बढ़ा और भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया. माता पार्वती के क्रोधित होने पर भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवन दिया और उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया. इसी के बाद गणेश गजानन कहलाए. स्थानीय लोग इसी कथा को डोडीताल से जोड़ते हैं.
-पं. संतोष खंडूड़ी, पुरोहित, मां अन्नपूर्णा मंदिर डोडीताल-



