
चमोली, 23 अप्रैल। विश्व प्रसिद्ध चारधाम में शुमार भू बैकुंठ बदरीनाथ धाम के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार और विधि विधान से खोल दिए गए हैं. भगवान बदरी विशाल के कपाट सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर 6 महीने के लिए श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए. इस मौके पर बदरीनाथ मंदिर को करीब 20 क्विंटल फूलों से सजाया गया. जिससे धाम की छटा देखते ही बन रही है.
सुबह 6:15 बजे खुले बदरीनाथ धाम के कपाट: बता दें कि गुरुवार यानी 23 अप्रैल को सुबह 6:15 बजे बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए दर्शनों के लिए खोल दिए गए हैं. कपाट खुलते ही पूरा मंदिर परिसर ‘जय बदरी विशाल’ के जयकारों से गूंज उठा. इस मौके पर हजारों लोग कपाट खुलने के साक्षी बने. जो भगवान बदरी विशाल के दर्शन और खास पल के साक्षी बन कर खुद को भाग्यशाली मानते दिखे. कपाट खुलते ही भक्तों की लाइन दर्शनों के लिए लग गई हैं. खुद सीएम धामी बदरीनाथ में मौजूद हैं.
आस्था, भक्ति और श्रद्धा से जुड़े चारधाम यात्रा का आगाज

वहीं, अब बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही उत्तराखंड की चारधाम यात्रा 2026 पूरी तरीके से सुचारू हो गई है. गौर हो कि सबसे पहले यानी 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट खोल दिए गए थे. जिसके बाद 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट भी खोले गए. इसके साथ ही अब आस्था, भक्ति और श्रद्धा से जुड़ा चारधाम यात्रा का आगाज हो गया है. चारधाम यात्रा को लेकर जबरदस्त उत्साह श्रद्धालुओं में देखने को मिल रहा है.
चारधाम यात्रा ड्यूटी में तैनात पुलिस बल को भीड़ नियंत्रण के साथ यात्रियों के साथ ‘अतिथि देवो भवः’ एवं उत्तराखंड पुलिस की थीम ‘मित्रता, सेवा, सुरक्षा’ की भावना के अनुरूप व्यवहार करने को कहा है. ताकि श्रद्धालु उत्तराखंड से पॉजिटिव अनुभव लेकर लौटें.बदरी केदारनाथ मंदिर समिति से लेकर पुलिस ने सारी व्यवस्थाएं चाक चौबंद की है.
सुरजीत सिंह पंवार, एसपी चमोली गढ़वाल
भू बैकुंठ क्यों कहते हैं बदरीनाथ को
क्यों कहा जाता है बदरीनाथ धाम को भू यानी धरती का बैकुंठ? बता दें कि भगवान विष्णु को समर्पित बदरीनाथ धाम चमोली जिले में अलकनंदा नदी तट पर स्थित है. जो हिंदुओं के प्रमुख और अहम तीर्थ स्थलों में ये एक है. यह मंदिर समुद्र तल से करीब 3,133 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है. जो देश के चारधाम (बदरीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम) के अलावा यह छोटे चारधाम (उत्तराखंड के चारधाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ) में भी से एक है.
बदरीनाथ धाम को भू बैकुंठ यानी धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है. यहां मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां हैं. जिनमें सबसे प्रमुख भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर (शालिग्राम) की प्रतिमा है. बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में विराजमान हैं. जबकि, भगवान विष्णु के प्रतिमा के बगल में कुबेर जी, लक्ष्मी जी और नारायण जी की मूर्तियां है.
बदरीनारायण के 5 स्वरूपों की होती है पूजा
बदरीधाम में बदरी नारायण के 5 स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है. भगवान विष्णु के इन 5 रूपों को ‘पंच बदरी’ के नाम से भी जाना जाता है. बदरीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी चमोली जिले में ही स्थित हैं. बदरीनाथ पांचों मंदिरों में से मुख्य एवं अहम है. इसके अलावा योगध्यान बदरी, भविष्य बदरी, वृद्ध बदरी और आदिबदरी शामिल हैं.
दक्षिण भारत से आते हैं बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी
माना जाता है कि भगवान नारायण यानी विष्णु को समर्पित बदरीनाथ मंदिर को आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों धाम (बदरीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम) में से एक के रूप में स्थापित किया था. यह मंदिर 3 भागों में बंटा हुआ है. जिसमें गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभामंडप शामिल हैं. शंकराचार्य व्यवस्था के तहत बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से आते हैं.
कपाट उदघाटन से पहले ये परंपराएं हुई पूरी
सुबह 4 बजे- बदरीविशाल के दक्षिण द्वार से भगवान कुबेर जी का प्रवेश।
सुबह 4 बजकर 15 मिनट-मंदिर कर्मचारी ड्यूटी पर तैनात।
तड़के 5.30 बजे- रावल जी, धर्माधिकारी व वेदपाठियों का उद्धव जी के साथ मंदिर में प्रवेश।
तड़के 5.40 बजे- रावल और धर्माधिकारियों द्वारा द्वार पूजन।
सुबह 6 बजकर 15 मिनट- श्रद्धालुओं के लिए बदरीनाथ धाम के कपाट खुले।
पूर्वाह्न ग्यारह बजे से गर्भगृह में भगवान बदरीनाथ की पूजाएं शुरु।



