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पौड़ी के तमलाग गांव में आस्था और परंपरा का गवाह बना ऐतिहासिक ‘मोरी मेला’ संपन्न video

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पौड़ी गढ़वाल, 7 जुलाई, 26. जनपद पौड़ी गढ़वाल की पट्टी गगवाड़स्यूं पट्टी स्थित तमलाग गांव में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक मौरी मेला 6 जुलाई 2026 को विधिवत संपन्न हो गया। हर 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होने वाला यह छह माह तक चलने वाला धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव महाभारत कालीन लोक मान्यताओं, पांडव परंपरा और उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का अद्भुत संगम माना जाता है। मेले में स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रवासी ग्रामीणों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। महाकुंभ की तरह इस भव्य मेले का चक्र 12 वर्षों का होता है, जो ग्रामीणों को उनकी प्राचीन लोक विरासत से जोड़ता है।

हर 12 साल बाद लगता है तमलाग मेला
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में वनवास के दौरान पांडव तमलाग और समीपवर्ती कुंडी गांव में ठहरे थे। उस समय ग्रामीणों ने उनका आत्मीय स्वागत और सत्कार किया था। लोक परंपरा के अनुसार माता कुंती ने तमलाग को अपनी ससुराल तथा कुंडी गांव को अपना मायका माना। इसी स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए दोनों गांवों में हर 12 वर्ष बाद इस भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

प्रवासियों और बेटियों का मिलन
इस मेले की सबसे खास बात यह है कि देश-विदेश में रह रहे प्रवासी इस मौके पर अपने पैतृक गांव लौटते हैं। जिन बेटियों की शादी अन्यत्र हो गई है (ध्याणी), उन्हें विशेष न्योता देकर बुलाया जाता है ताकि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और मान्यताओं से अवगत कराया जा सके।

मंगशीर से आषाढ़ तक 6 महीने चलता है मौरी मेला
मौरी मेले की शुरुआत मार्गशीर्ष माह से होती है और यह आषाढ़ माह तक लगभग छह महीने चलता है। इस दौरान तमलाग के भैरव मंदिर परिसर में ढोल-दमाऊं और ढोल सागर की पारंपरिक थाप पर पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है। लोक परंपरा के अनुसार पश्वाओं के माध्यम से पांडवों का अवतरण होता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

मेले के दौरान मंडाण नृत्य, गेंडी वध तथा जंगल से पवित्र चीड़ के वृक्ष लाकर मंदिर में स्थापित करने जैसी पारंपरिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक रस्में भी निभाई जाती हैं। इन अनुष्ठानों के माध्यम से क्षेत्र की प्राचीन लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।

मेले के समापन अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, स्थानीय ग्रामीणों और प्रवासी लोगों की उपस्थिति ने मेले को भव्य स्वरूप प्रदान किया। मौरी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जो हर 12 वर्ष बाद लोगों को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता है।

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