UKD सभी 70 सीटों पर लड़ेगी चुनाव, ‘संकल्प, नए उत्तराखंड का’ नीतिगत एजेंडा जारी

देहरादून, 2 अगस्त, 26. उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) UKD ने नए उत्तराखंड का संकल्प लेते हुए अपनी तैयारी और विचार मंथन पूरी एकजुटता के साथ शुरू कर दिया है.
UKD ने नया एजेंडा संकल्प नए उत्तराखंड का जारी किया
दरअसल, रविवार यानी 2 अगस्त को उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह, पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष व पूर्व विधायक काशी सिंह ऐरी समेत कई दिग्गज नेता एक मंच पर आए. इस दौरान नए उत्तराखंड का संकल्प लेते हुए अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया. यूकेडी के सभी नेताओं ने नीतिगत एजेंडा ‘संकल्प, नए उत्तराखंड का’ जारी किया और आगामी विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर अकेले ही चुनाव मैदान में कूदने का ऐलान कर दिया.
मूल निवासियों के अधिकारों संरक्षण किया जायेगा
मूल निवास के तहत उत्तराखंड के मूल निवासियों के अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए. यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने ये भी कहा कि यूकेडी मूल निवास को कानूनी मान्यता देकर उत्तराखंड के मूल निवासियों को विशेष अधिकार, संरक्षण और अवसर प्रदान करेगा. ताकि, उन्हें अपने ही राज्य के विकास और समृद्धि में न्यायसंगत भागीदारी मिल सके.
विशिष्ट भू कानून किया लागू करेगा UKD
इसके अलावा व्यापक भूमि सुधार (सही भू-कानून) के तहत यूकेडी पुराने भूमि कानूनों के स्थान पर उत्तराखंड के लिए एक आधुनिक, व्यापक और राज्य-विशिष्ट भू-कानून लागू करेगा. जो भूमि अधिकारों की रक्षा, चकबंदी को सशक्त, सतत विकास को प्रोत्साहित और भूमि प्रशासन को आधुनिक बनाएगा.
रोजगार और पलायन पर रहेगा विशेष फोकस
सुरेंद्र कुकरेती ने आगे बताया कि इसके अलावा उत्तराखंड क्रांति दल पर्वतीय जिलों को रोजगार, उद्यमिता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सतत विकास के सशक्त केंद्रों में विकसित कर पलायन समाप्त करेगा. ताकि, हर उत्तराखंडवासी अपने घर के पास ही समृद्ध जीवन जी सके.
उत्तराखंड के मूल निवासियों को नहीं मिल रहा न्याय
यूकेडी नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की धरती पर पीढ़ियों से रहने वाले लोगों ने अपने श्रम, त्याग और समर्पण से यहां के जंगलों की रक्षा की है. संस्कृति को संरक्षित रखा है. गांवों को जीवित रखा है और हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को सुरक्षित बनाए रखा है. दशकों तक उत्तराखंड के मूल निवासियों ने राज्य के जंगलों, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय धरोहर की रक्षा का सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दायित्व निभाया, लेकिन राज्य के विकास से उत्पन्न अवसरों में उन्हें न्यायसंगत हिस्सा प्राप्त नहीं हुआ.
इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, कमजोर संपर्क व्यवस्था, बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष और लगातार पलायन गंभीर चुनौतियां बन चुके हैं. जो गांव कभी जीवंत और आत्मनिर्भर पर्वतीय जीवन के प्रतीक थे, वे आज धीरे-धीरे वीरान होते जा रहे हैं. इसलिए नहीं कि वहां के लोग अपने घर छोड़ना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि परिस्थितियां उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर रही हैं.



