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भारत के उस गांव की शौर्यगाथा, जिसने आजादी के 5 साल पहले ही फहरा दिया था तिरंगा

सार्थकपहल.काम। भारत की आजादी की लड़ाई प्रेरणादायक कहानियों से भरी है। कर्नाटक का एसुरु (इस्सुरु) गांव भी इसका उदाहरण है। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांव वालों ने आजादी की जंग छेड़ दी थी। अंग्रेजों को टैक्स देने से मना कर दिया था। भारतीय तिरंगा फहराकर और अपने गांव को औपनिवेशिक शासन से आजाद घोषित करके ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती दी थी।

भारत के एसुरु गांव की ऐतिहासिक कहानी
कर्नाटक के शिवमोग्गा (Shimoga) जिले का एसुरु (Esuru) गांव का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक विशेष स्थान है। भारत सरकार की ऑफिशियल वेबसाइट amritkaal.nic.in पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, साल 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया था तो इस गांव के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया।

गांव ने आजादी से 5 साल पहले फहराया था तिरंगा, बनाई ‘स्वराज सरकार’
कर्नाटक के शिवमोगा जिले में स्थित एसुरु गांव को 1942 में आजादी की घोषणा करने वाला पहला गांव माना जाता है। 29 सितंबर 1942 को एसुरु के लोगों ने गांव में भारतीय तिरंगा फहराया था। यह घटना भारत की आजादी (15 अगस्त 1947) से लगभग 5 साल पहले हुई थी। तिरंगा फहराना केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती थी कि गांव अब अंग्रेजी हुकूमत को नहीं मानेगा।

आजादी की घोषणा के बाद यहां के लोगों ने अपनी ‘प्रति सरकार’ यानी प्रांतीय सरकार बनाई थी। उन्होंने ‘स्वराज सरकार’ का बोर्ड भी लगाया और तिरंगा फहराया। अंग्रेज अधिकारियों ने इस पर प्रतिक्रिया दी और गांव पर दोबारा कब्जा करने के लिए सेना भेजी। इसके नतीजे में हिंसक झड़प हुई। इसमें रेवेन्यू ऑफिसर मारा गया था, 5 युवाओं को फांसी दी गई और सैकड़ों लोगों को जेल में डाल दिया गया था। गांव के लोगों ने ब्रिटिश सरकार को कर (Tax) देने से इनकार कर दिया और गांव में ‘स्वराज सरकार’ का बोर्ड लगाकर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। यह कदम उस समय बेहद साहसिक माना गया, क्योंकि पूरे देश पर ब्रिटिश शासन का नियंत्रण था।

एसुरु गांव से जुड़े कुछ जानकारी
एसुरु (Issuru/Esuru) गांव कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में है।
यह गांव 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का प्रमुख केंद्र बना था।
गांव के लोगों ने 29 सितंबर 1942 को भारतीय तिरंगा फहराकर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी।
एसुरु ने भारत की स्वतंत्रता (15 अगस्त 1947) से लगभग 5 साल पहले स्वयं को अंग्रेजों से स्वतंत्र घोषित किया था।
ग्रामीणों ने गांव में स्वराज सरकार (Swaraj Sarkar) का बोर्ड लगाया था।
गांव के लोगों ने ब्रिटिश सरकार को टैक्स (कर) देने से मना कर दिया, जो उनके विरोध का बड़ा प्रतीक था।
इस आंदोलन के बाद 8 मार्च 1943 को गांव के 5 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई थी।

क्यों याद किया जाता है एसुरु?
देश की आजादी के अवसर पर एसुरु गांव को भारत के उन ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में असाधारण साहस दिखाया। यहां स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में स्मारक भी बनाया गया है। यह गांव बताता है कि आजादी केवल बड़े शहरों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि देश को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी उस समय आजाद हिंद रेडियो के माध्यम से एसुरु गांव के इस अभूतपूर्व साहस और शहीदों के बलिदान को सलाम किया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इस गांव का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

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