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उत्तराखंड में 30 साल बाद पांडव नृत्य की वापसी, क्यावा गांव में ढोल-बाजे के साथ मनाया गया त्योहार

त्यूणी, 3 नवम्बर, 26. जौनसार में बहलाड खत से जुड़े क्यावा गांव में करीब 30 वर्ष बाद पौराणिक देवस्थल (ठारी) के पूजन में पांडव नृत्य का आयोजन होने से लोगों में उत्साह है। पुरोहित पंडित, देवमाली व कारिंदों ने विधि विधान से पूजा अर्चना कर देवता से खुशहाली की कामना की। तीन दिन चले पांडव नृत्य से धार्मिक अनुष्ठान मंगलवार को संपन्न हुआ।

स्थानीय मान्यता के अनुसार जौनसार बावर में कई जगह निर्धारित प्रक्रिया के तहत पांडव नृत्य की परंपरा है। बहलाड खत के क्यावा गांव में स्थानीय लोगों ने देवता की आज्ञा से तीन दशक के लंबे अंतराल बाद पांडव नृत्य को धार्मिक अनुष्ठान रखा। यहां जमा सैकड़ों लोग धार्मिक परंपरा का हिस्सा बने। पुरोहित पंडित, देवमाली व कारिंदों ने ग्रामीणों के साथ वैदिक मंत्रोच्चार से पौराणिक देवस्थल जिसे स्थानीय भाषा में ठारी कहते हैं, का पूजन किया।

स्थानीय महिलाओं व पुरुषों ने ढोल बाजे के साथ ठारी के पूजन में पांडव नृत्य से देवता की स्तुति की। पांडव नृत्य के समय कई लोगों में देवता के भाव प्रकट हो गए। ढोल बाजे के साथ पांडवों ने घर-घर जाकर लोगों से भिक्षा मांगी और पंडितों ने खुशहाली की कामना को गांव के चारों तरफ सूत्र बांधा। गांव में फेरा लगाने के बाद पांडवों ने देवता की आराधना की। पांडव नृत्य एवं धार्मिक अनुष्ठान में प्रत्येक परिवार से एक-एक सदस्य ने उपवास रखा।

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