उत्तराखंडदेश-विदेशमनोरंजनयूथ कार्नरशिक्षासामाजिक

बदरीनाथ धाम को बदरुद्दीन शाह की मजार बताने वाले आरोपी मौलवी कोर्ट से बरी

गोपेश्वर, 8 फरवरी। करीब पांच साल पहले बदरीनाथ धाम को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योतिर्मठ की अदालत ने आरोपी दारुल उलूम देवबंद सहारनपुर के मौलाना को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। यह मामला काफी चर्चा में रहा था। बदरीनाथ धाम करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है और शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में से एक है।

26 जुलाई 2021 को इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ था। इसमें एक व्यक्ति हिंदुओं की आस्था के केंद्र बदरीनाथ धाम को बदरुद्दीन शाह की मजार बताते हुए इसे मुसलमानों को सौंपने की अपील कर रहा था।

इससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची थी। मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा हस्तक्षेप करने के बाद मामला चर्चाओं में आ गया था। इस पर बदरीनाथ थाने में दारुल उलूम देवबंद, सहारनपुर के मौलाना अब्दुल लतीफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने मामले में जांच के बाद 21 अगस्त 2023 को न्यायालय में आरोप पत्र दायर किया था।

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता नवनीत डिमरी ने बताया कि वर्ष 2024 में आरोपित ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आत्मसमर्पण किया था। बाद में न्यायालय से उसे जमानत मिल गई थी।

मामले में सुनवाई के दौरान बचाव व अभियोजन पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद न्यायिक मजिस्टेट्र अनिल कुमार कोरी की अदालत ने आरोपित मौलाना अब्दुल लतीफ को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता नवनीत डिमरी व अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक अभियोजन अधिकारी मनमोहन सिंह ने जिरह की।

तकनीकी साक्ष्य शून्य
अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि उक्त वीडियो किस आइपी एड्रेस से, किस तारीख और किस समय अपलोड किया गया था। पुलिस को यूट्यूब के माध्यम से भी वीडियो की सत्यता और स्रोत के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल सकी थी। मामले में अभियोजन पक्ष तकनीकी सुबूत नहीं पेश कर सका।

संदेह का लाभ
अपने आदेश में अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस डिजिटल प्रमाण के धार्मिक भावना को भड़काने के तहत अपराध सिद्ध करना संभव नहीं है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेश से परे साबित करने में असफल रहा है। अत: आरोपित को बरी करना न्यायोचित प्रतीत होता है। दरअसल यदि आरोपी जांच में पुलिस का सहयोग कर रहा है और उसके फरार होने की आशंका नहीं है तो भारतीय न्याय व्यवस्था में (जमानत नियम है, जेल अपवाद) के सिद्धांत के तहत आरोपी को राहत दे दी जाती है।

Related Articles

Back to top button