
थराली ,24 अप्रैल। प्रसिद्ध लाटू देवता मंदिर के कपाट आगामी 1 मई यानी वैशाख पूर्णिमा पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ खोल दिए जाएंगे. पहली बार इस मौके पर दो दिवसीय मेले का भी आयोजन किया जाएगा. जिसकी तैयारियां जोरों पर है. यह मंदिर अपनी कुछ खास मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. जिसकी वजह से ग्रामीणों की लाटू देवता पर अगाध आस्था रहती है.
एक मई को दोपहर 1 बजे खुलेंगे कपाट
बता दें कि आगामी 1 मई को वैशाख पूर्णिमा पर देवाल के वांण गांव स्थित प्रसिद्ध लाटू धाम के कपाट दोपहर 1 बजे भक्तों के लिए खोल दिए जाएंगे. इस साल पहली बार दो दिवसीय यानी 1 और 2 मई को लाटू देवता जागृतिक पर्यटन सांस्कृतिक महोत्सव के बैनर तले भव्य मेले का भी आयोजन किया जाएगा.
सांस्कृतिक कार्यक्रम में ये लोग गायक बांधेंगे समां
मेला कमेटी के अध्यक्ष कृष्णा बिष्ट ने बताया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाएगा. जिसमें प्रसिद्ध गायक सौरभ मैठाणी, विवेक नौटियाल, वीरू जोशी, कुंदन बिष्ट, मोनिका, देवराज आगरी, कुंवर नेगी आदि गायक एवं गायिकाएं प्रतिभाग करेंगे.

लाटू देवता मंदिर परिसर में पशु बलि पर प्रतिबंध
इस साल से प्राचीन लाटू मंदिर में पशु बलि प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है. हाल में ही आयोजित इस बैठक में मंदिर समिति और ग्रामीणों की सर्वसम्मति से यह फैसला लिया जा चुका है. इस बैठक में तय किया गया कि अब मंदिर परिसर में किसी भी तरह की पशु बलि नहीं दी जाएगी. मनौती पूरी होने पर भक्त केवल सात्विक पूजा-अर्चना करेंगे. ग्रामीणों ने इसे सामाजिक सुधार एवं धार्मिक परंपराओं में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक अहम कदम बताया है.
पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर करते हैं पूजा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लाटू देवता मंदिर के गर्भगृह को कपाट खुलने के दौरान पूजा-अर्चना कर कुछ घंटों बाद बंद कर दिया जाता है. जबकि, मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए 6 महीने तक लिए खुले रहते हैं. इतना ही नहीं लाटू देवता की पूजा करने वाले पुजारी भी अपनी आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में प्रवेश कर पूजा-अर्चना करते हैं. जबकि, भक्त भी लाटू देवता के मंदिर की परिधि से 50 मीटर दूर से ही देवता को हाथ जोड़कर मन्नतें मांगते हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि पुजारी को छोड़कर किसी को भी मंदिर की परिधि से निश्चित दूरी से अंदर जाने की अनुमति नहीं होती है. पुजारी भी पौराणिक नियमों के तहत अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर के अंदर प्रवेश कर पूजा आदि करते हैं. आज तक भी किसी को ये भी पता नहीं है कि मंदिर के अंदर लाटू देवता किस रूप में विराजमान हैं. कहा तो ये भी जाता है कि अगर कोई मंदिर के अंदर जाने का प्रयास करता है तो वो मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है या फिर दूसरे लोगों को कुछ बताने लायक नहीं रह जाता.
नंदा राजजात की अगुवाई करते लाटू देवता
धार्मिक मान्यताओं के तहत लाटू देवता, मां नंदा राजराजेश्वरी के धर्म भाई माने जाते हैं. मां नंदा की 12 साल में आयोजित होने वाली ‘नंदा राजजात यात्रा’ में लाटू देवता वाण गांव से आगे निर्जन पड़ावों में मां नंदा की अगुवाई करते हैं. इसके अलावा हर साल आयोजित होने वाले ‘नंदा लोकजात यात्रा’ के दौरान भी लाटू देवता का निशान वैदनी कुंड तक मां नंदा के आगे-आगे चलता है. लाटू देवता मां नंदा को अतिप्रिय होने के चलते ग्रामीण लाटू देवता की हर साल विशेष पूजा करते हैं.



