देश मना रहा विविधताओं से रंगी आजादी की 80वीं वर्षगांठ, पहली बार गाया जायेगा वंदे मातरम

नई दिल्ली, 14 अगस्त, 26. स्वतंत्रता दिवस पर देश आज अपना 80वां जश्न मना रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के लाल किले से इस राष्ट्रीय समारोह की अगुवाई कर रहे हैं. इस साल का आयोजन इसलिए भी खास है क्योंकि राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने का जश्न भी इसी मौके पर मनाया जा रहा है.
राष्ट्रीय कार्यक्रम में पहली बार गाया जायेगा वंदे मातरम
पहली बार लाल किले के इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम को औपचारिक रूप से गाया जाएगा. समारोह में देश की युवा शक्ति की ऊर्जा और उम्मीदों पर खास ध्यान दिया जा रहा है और यह भी दिखाया जा रहा है कि युवा पीढ़ी किस तरह भारत को साल 2047 तक विकसित भारत बनाने के सफर में योगदान दे रही है. प्रधानमंत्री मोदी के लाल किले पहुंचने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उनका स्वागत करेंगे. इसके बाद गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण होगा, जिसमें सेना, नौसेना, वायुसेना और दिल्ली पुलिस के जवान शामिल होंगे.
प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर झंडा फहराएंगे, जिसके साथ ही 1721 फील्ड बैटरी की तरफ से 21 तोपों की सलामी दी जाएगी. झंडा फहराते ही वायुसेना के हेलीकॉप्टर फूलों की बारिश करेंगे, जिसके बाद प्रधानमंत्री देश को संबोधित करेंगे. उनके भाषण के अंत में करीब 2500 एनसीसी कैडेट और माई भारत के वालंटियर वंदे मातरम् और राष्ट्रगान गाएंगे.
भारत आज अपनी आज़ादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. 79 वर्षों की यात्रा पूरी हो चुकी है. इस दौरान दुनिया में बहुत कुछ बदला. लेकिन तमाम बाहरी परिस्थितियों और आंतरिक संकटों के बीच भी भारत एक लोकतंत्र के रूप में मजबूती के साथ दुनिया के सामने खड़ा है. यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है. यह हमारी ताक़त भी है और खूबसूरती भी. हमारी शक्ति भी है और हमारी विशेषता भी. देश ने आज़ादी को इन 79 सालों में कई तरीकों के देखा और समझा है.
डंडे नहीं, झंडे वाली आज़ादी…
जहां भी एक झंडा होता है, उसमें एक डंडा होता है. झंडे को साधे. तटस्थ भाव से. डंडा डटा रहता है. एक व्यवस्था की तरह. झंडा लहराता है. हवाओं के साथ इतराता है. झूमता है. जीवन और बयार का संकेत देता है. डंडा मगर इस झंडे को नियंत्रित नहीं करता. बस थामे रहता है. ताकि व्यवस्था बनी रहे. झंडा फहरता रहे. लहरता रहे. परचम ऊंचा रहे. बुलंद रहे. हवा पूरब से आए या पश्चिम से. उत्तर से बहे या दक्खिन का जोर हो. झंडे को हवाओं से बातें करने दे. यही आदर्श अवस्था है सत्ता और समाज की. यही तरीका है लोकतंत्र में एक व्यवस्था और जनता के बीच तालमेल का. यही सीमाएं भी हैं. डंडे की भी और झंडे की भी.
आजादी के 80 साल: भारत में धर्म-संकट और संभावना
भारत जब 1947 को आजाद हुआ, तो यह सिर्फ एक देश की आजादी नहीं थी, बल्कि इसके साथ पाकिस्तान के रूप में एक नए देश का जन्म भी हुआ. भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म (Religion) के आधार पर हुआ. पाकिस्तान ने अपनी इस्लामी पहचान का झंडा खुलेआम बुलंद किया, लेकिन आजाद हुए भारत के सामने एक बुनियादी सवाल था कि इस बंटे-बचे हुए भू-भाग वाले देश में ‘धर्म’ की जगह क्या होगी? तकरीबन आठ दशक के इस सफर में यह सवाल कभी बेहद जटिल तो कभी उलझे तरीके से सामने आता रहा है, लेकिन पूरी तरह सुलझा कभी भी नहीं. आजाद भारत ने अपने प्रसिद्ध पर्यायवाची नाम हिंदुस्तान को अपनाया जरूर, लेकिन इस नाम को कभी भी धार्मिक पहचान का आधार नहीं बनाया.
आन देश की, शान देश की, देश की हम संतान हैं। तीन रंगों से रंगा तिरंगा, अपनी यह पहचान है। स्वतंत्रता दिवस की आप सभी हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद, जय भारत।



