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ज्येष्ठ की तपती गर्मी में निर्जला एकादशी का महाव्रत रख श्रद्धालु मांग रहे सुख-समृद्धि का वरदान

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देहरादून, 24 जून। निर्जला एकादशी सनातन धर्म के सभी 24 एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण और कठिन मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत रखा जाता है, जो आज यानी 25 जून को है। गुरुवार को श्रद्धा, आस्था का पर्व निर्जला एकादशी मनाई जा रही है. ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की यह एकादशी समस्त एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है. इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार, महाबली भीम ने भी पांडवों के कल्याण के लिए इस कठिन व्रत का पालन किया था.

निर्जला का अर्थ और नियम
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस व्रत में अन्न के साथ-साथ जल का त्याग भी किया जाता है। सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय (पारणा काल) तक पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। ज्येष्ठ महीने की भीषण गर्मी में बिना पानी के रहना इसे सबसे कठिन तपस्या बनाता है।

निर्जला एकादशी का आध्यात्मिक संदेश
यह व्रत केवल जल और अन्न का त्याग नहीं है, बल्कि यह अपने मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने का एक मार्ग है. यह दिन हमें सिखाता है कि किस प्रकार कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहकर प्रभु की भक्ति कर सकते हैं. जो भक्त वर्ष भर की सभी एकादशियों का उपवास नहीं कर पाते, उनके लिए आज का दिन साक्षात मोक्षदायी है.

इस वर्ष का शुभ मुहूर्त और समय (2026)
एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026, रात 8:09 मिनट से.
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026, रात 9:14 मिनट तक.

उदया तिथि के अनुसार व्रत
आज, 25 जून 2026, गुरुवार को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जा रहा है.

व्रत पारण (व्रत खोलने का समय)
26 जून 2026, शुक्रवार को सुबह 05:25 से 08:13 मिनट के बीच.

ब्रह्म मुहूर्त स्नान
आज प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें.

श्री हरि का अभिषेक
भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं. उन्हें पीतांबर (पीले वस्त्र), चंदन, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें. श्री विष्णु को पीले फल, ऋतु फल, और विशेष रूप से मिश्री-तुलसी का भोग लगाएं.

मंत्र जाप
पूरे दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का मनन करें. यह मंत्र न केवल नकारात्मकता दूर करता है, बल्कि मन को गहन शांति लाता है. यह व्रत एक आध्यात्मिक डिटॉक्स की तरह है. इसे स्वस्थ तरीके से करने के लिए इन बातों का ध्यान रखें. क्रोध, अहंकार और कटु वचनों से दूर रहें. मन को शांत रखने से व्रत का शारीरिक और मानसिक लाभ दोगुना हो जाता है. निर्जला एकादशी के दिन जल दान का विशेष महत्व है. प्यासे को पानी पिलाना या पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना इस दिन का सबसे बड़ा पुण्य कर्म है.

तुलसी की मर्यादा
ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते. पूजन के लिए एक दिन पूर्व ही तुलसी दल तोड़कर रख लें.

भक्ति में लीन- अनावश्यक कार्यों में ऊर्जा व्यर्थ न करें. अपना समय भगवत कथा सुनने या सात्विक भजन सुनने में लगाएं.

दान का महत्व
आज के दिन किया गया दान अनंत गुणा फल देता है. प्याऊ लगवाना, पशु-पक्षियों के लिए पानी का पात्र रखना, या जरूरतमंदों को जल-अन्न का दान करना आज के दिन का सर्वश्रेष्ठ कार्य है. पारण के समय ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देने के बाद ही स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें.

पौराणिक महत्व
कथाओं के अनुसार महाभारत काल में भीमसेन के लिए हर महीने एकादशियों पर भूखा रहना मुश्किल था, क्योंकि उनकी भूख बहुत तीव्र थी। तब महर्षि व्यास ने उन्हें सुझाव दिया यदि वे साल में केवल एक बार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का पूर्ण रूप से निर्जल व्रत रख लें तो उन्हें साल भर की सभी एकादशियों पर बराबर पुण्य मिल जायेगा। इसी कारण इसे भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है।

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