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आज पूर्णिमा तिथि से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत, 10 अक्टूबर तक चलेगा पितृ पक्ष

देहरादून, 25 सितंबर, 26. भाद्रपद पूर्णिमा तिथि से श्राद्ध पक्ष का आरंभ हो जाता है जो आश्विन कृष्ण अमावस्या तिथि पर समाप्त होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि 16 दिनों का यह समय मनुष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह भूत का वर्तमान से कनेक्शन का समय होता है। भूत वह जो कभी हमारे बीच हमारे निकट संबंधी रहे हैं और जिन्होंने जब तक शरीर रहा हमारे लिए हमारे परिवार के अपना सर्वस्व अर्पित किया उनके प्रति आभार और श्रद्धा प्रकट करने का समय माना जाता है पितृ पक्ष जिसे बहुत से लोग श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जानते हैं। लेकिन पितृपक्ष में हर दिन का अपना विशेष महत्व है। स्कंद पुराण, गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जिस तिथि पर हमारे पूर्वज दादा, दादी, पिता, माता जिनकी मृत्यु हो गई है उनके नाम से उस तिथि पर उनका विशेष पूजन करना चाहिए और अन्न जल प्रदान करना चाहिए।

आज पूर्णिमा श्राद्ध से शुरू हो रहे हैं पितृपक्ष
मान्यता है कि पितृपक्ष में पितरों का विधिवत श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. इस साल पितृपक्ष की तारीख को लेकर लोगों के बीच बड़ा कन्फ्यूजन है. कोई 26 सितंबर तो कोई 27 सितंबर को पहला श्राद्ध बता रहा है. इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहेगा. 26 सितंबर को भाद्रपद मास की पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा. जिन लोगों के पूर्वजों की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई है. उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाएगा. इसके बाद 27 सितंबर को पितृपक्ष की औपचारिक शुरुआत मानी जाएगी. इस दिन अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि होगी. प्रतिपदा तिथि को जिन लोगों के पूर्वजों का निधन हुआ है, उनका श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा.

पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो. अगर किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि या श्राद्ध की सही तिथि याद नहीं है तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनका श्राद्ध करने की धार्मिक परंपरा बताई गई है.

पितृपक्ष में क्या करना चाहिए?
पितृ पक्ष में पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करने की परंपरा है. इस दौरान पितरों का श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और भोजन का दान किया जाता है. अगर किसी कारण से विधि-विधान से श्राद्ध करना संभव नहीं है तो सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों को भोजन या खाद्य सामग्री दान करने की बात कही गई है. इसमें चावल, दाल, आटा, नमक, फल, सब्जियां, घी, गुड़ और वस्त्र जैसी चीजें दान की जा सकती हैं.

पितृपक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
पितृपक्ष में शादी, सगाई, गृह प्रवेश और नए कारोबार की शुरुआत जैसे शुभ कार्यों से बचना चाहिए. नई संपत्ति और वाहन खरीदने से भी इस दौरान परहेज करने की परंपरा बताई गई है. कई लोग इस अवधि में नए कपड़े खरीदने से भी बचते हैं. हालांकि, ये बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़ी हैं.

पितृपक्ष 2026 का कैलेंडर
पूर्णिमा श्राद्ध- 26 सितंबर 2026, शनिवार
प्रतिपदा तिथि श्राद्ध– 27 सितंबर 2026, रविवार
द्वितीया श्राद्ध- 28 सितंबर 2026, सोमवार
तृतीया श्राद्ध– 29 सितंबर 2026, मंगलवार
चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध- 30 सितंबर 2026, बुधवार
षष्ठी तिथि का श्राद्ध- 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार
सप्तमी तिथि का श्राद्ध- 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
अष्टमी तिथि का श्राद्ध- 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
नवमी तिथि का श्राद्ध- 4 अक्टूबर 2026, रविवार
दशमी तिथि का श्राद्ध- 5 अक्टूबर 2026, सोमवार
एकादशी तिथि का श्राद्ध- 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार
द्वादशी तिथि का श्राद्ध– 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
मघा तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध- 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार
चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध- 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
सर्वपितृ अमावस्या-10 अक्टूबर 2026, शनिवार

भाद्रपद पूर्णिमा का इसलिए खास महत्व है कि इस दिन उन लोगों का तर्पण और पिंड अर्पित किया जाता है जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि पर हुई है। और इसके साथ ही पूर्णिमा के दिन श्रषि तर्पण किया जाता है। ऋषि तर्पण में अगस्त मुनि का तर्पण उनकी पत्नी लोपामुद्रा के साथ विशेष रूप करने का विधान है। इनके साथ वशिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, भरद्वाज, विश्वास और गौतम श्रषि के नाम से भी जल तर्पण किया जाता है।

ऋषि तर्पण की कथा महात्म्य
पितृपक्ष में सबसे पहले दिन ऋषि तर्पण क्यों किया जाता है इसकी एक बहुत ही सुंदर कथा है जिसे ध्यान पूर्वक सुनना और समझना चाहिए। कथा के अनुसार एक समय में दो असुर भाई हुए आतापी और वातापी। वृत्रासुर के युद्ध में मारे जाने के बाद दोनों असुरों ने ऋषि मुनियों को मारना शुरू किया और इसके लिए वे अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग करते थे। आतापी के पास ऐसी दिव्य मायावी शक्ति थी जिससे वह मरे हुए व्यक्ति का नाम लेकर उसे पुनः जीवित कर सकता था। जबकि वातापी इच्छा के अनुसार रूप बदल सकता था।

ऋषि तर्पण मंत्र
ओम आगच्छ मुनि शार्दूल तेजोरास जगतपते। उदयन्ते लंका द्वारे अर्धोऽयं प्रति गृह्यताम् ॥
इस मंत्र से तीन बार अंजुली में जल लेकर भूमि पर छोड़ें।

इसके बाद फिर से जल अंजुली में जल लेकर तीन बार जल जल छोड़ें।
ओम कुम्भयोनि समुत्पन्न मुनीनां मुनिसत्तम्। उदयन्ते लंका द्वारे अर्थोऽयं प्रति गृह्यताम् ॥

इसके बाद फल फूल अक्षत तिल शंख में लेकर जल दें।
ओम शंखं पुष्पं फलन्तोयं रत्नानि विविधानि च।
उदयन्ते लंका द्वारे अर्धोऽयं प्रति गृह्यताम्।
ओम काश पुष्प प्रतीकाश वह्निमारुत सम्भव।
उदयन्ते लंका द्वारे अर्धोऽयं प्रतिगृह्यताम्।।

अब इस मंत्र से ऋषियों से प्रार्थना करें।
ओम आतापी भक्षितो येन वातापी च महावलः। समुद्रः शोषितो येन स मेऽगस्त्यः प्रसीदतु।

अब देवी लोपामुद्र को इस मंत्र से एक बार जालांजि दें
ओम लोपामुद्रे महाभागे राजपुत्रि पतिव्रते।
गृह्यणार्ध्वम्मया दत्तं मित्रवारुणि बल्लभे।

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