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परमार्थ निकेतन की पवित्र भूमि से डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नमन, 125वीं जयंती पर गूंजे वेद मंत्र

ऋषिकेश, 6 जुलाई, 26. परमार्थ निकेतन में अखंड भारत के प्रणेता एवं भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर विशेष यज्ञ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक चेतना, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता के आदर्शों को समर्पित रहा।

प्रखर शिक्षाविद और देश के सबसे युवा कुलपति
डाा. श्यामा प्रसाद का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के जाने-माने शिक्षाविद और कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। डा. मुखर्जी बचपन सेे ही मेधावी थे। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और इंग्लैंड में बैरिस्टर बने। मात्र 33 साल की उम्र वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने, जो उनकी असाधारण योग्यता को दर्शाता है।

परमार्थ निकेतन में यज्ञ के साथ याद किये गये डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि डॉ. मुखर्जी शिक्षा को चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय चेतना का आधार मानते थे। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में डॉ. मुखर्जी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण, सेवा, अनुशासन और नैतिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया।

एक देश एक विधान के प्रणेता डा. मुखर्जी की जयंती पर परमार्थ निकेतन में विशेष यज्ञ
इस अवसर पर स्वामी जी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” का संकल्प भारत की अखंडता और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता का प्रतीक था। उन्होंने उनके योगदान को भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया।

कार्यक्रम में विश्व को करुणा, शांति और अहिंसा का संदेश देने वाले 14वें दलाई लामा के 91वें जन्मदिवस पर भी शुभकामनाएं अर्पित की गईं। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उनके स्वस्थ, दीर्घायु एवं ऊर्जावान जीवन की कामना करते हुए कहा कि उनके करुणामय विचार विश्व में शांति, सद्भाव और मानवता की भावना को निरंतर मजबूत करते रहें।

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