
यमकेश्वर, 2 मई। जिले के पोखड़ा विकासखंड का उबोट गांव इन दिनों भक्ति, आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम का साक्षी बना हुआ है. 28 अप्रैल से शुरू हुए निरंकार देवता के भव्य अनुष्ठान ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया है. खास बात यह है कि यह पूजा पूरे 27 वर्षों बाद आयोजित हो रही है, जिससे ग्रामीणों में विशेष उत्साह और श्रद्धा देखने को मिल रही है.
उत्तराखंड की लोक परंपरा में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है. पहाड़, नदियां, झरने, पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों की पूजा केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का गहरा संदेश भी देती है. उबोट गांव में आयोजित यह अनुष्ठान उसी प्राचीन परंपरा को जीवंत कर रहा है, जहां आज भी लोग प्रकृति को अपना आराध्य मानते हैं. अनुष्ठान के दौरान एक अनूठी परंपरा देखने को मिली, जिसमें भक्तों ने आटे से विभिन्न पशुओं की आकृतियां बनाकर उनकी विधिवत पूजा-अर्चना की.

यह परंपरा मनुष्य और जीव-जंतुओं के बीच संबंध को दर्शाती है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है. आसपास के कई गांवों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं और भगवान निरंकार की पूजा में शामिल होकर पुण्य अर्जित कर रहे हैं. देव यात्राओं का गांव में आगमन पूरे माहौल को भक्तिमय बना रहा है.
निरंकार देवता की पूजा 27 साल बाद हो रही है, जिसमें विभिन्न गांवों से देव यात्राएं शामिल हुई हैं. इस पूरे अनुष्ठान की सबसे खास और रोमांचकारी परंपरा तब देखने को मिली, जब सभी ग्रामीण अपने गांव की सीमा पार कर पड़ोसी गांव पहुंचे. वहां स्थित मंदिर परिसर में मौजूद पंया वृक्ष की विधिवत पूजा-अर्चना की गई.
-सुरेंद्र सिंह रावत, सचिव, आयोजक मंडल
जानें क्या है मंदिर की रोचक कहानी
मान्यता है कि जब तक गरुड़ उस मंदिर के ऊपर मंडराना शुरू नहीं करता, तब तक उस वृक्ष की डाली नहीं काटी जाती. पूजा के दौरान श्रद्धालु प्रतीक्षा में रहे और कुछ ही समय बाद आस्था का अद्भुत दृश्य सामने आया. पहले एक गरुड़ मंदिर के ऊपर चक्कर लगाता दिखा, और फिर धीरे-धीरे पांच गरुड़ आकाश में मंडराते नजर आए. इसे देव अनुमति का संकेत मानते हुए ग्रामीणों ने विधिवत पंया वृक्ष की डाली काटी और उसे अपने गांव के मंदिर में स्थापित करने के लिए ले आए।



